Loading...
Image
Image
View Back Cover

भारत में जाति एवं प्रजाति , 5e

जाति संभवतः भारतीय समाज का सर्वाधिक प्रमुख पहलू है और हिन्दू जाति-व्यवस्था की उप-शाखाओं को समझे बिना बिना इसका अध्ययन अधूरा है। हिस्ट्री ऑफ़ सिविलाइज़ेशन श्रृंखला, जिसका संपादन 1932 में सी.के. ऑग्डेन द्वारा किया गया था, के अंतर्गत अपने सर्वप्रथम प्रकाशन के समय से ही ‘भारत में जाति एवं प्रजाति’ भारतीय समाजविज्ञान एवं मानवजाति विज्ञान के छात्रों के लिए एक मौलिक रचना रही है।

शिक्षकों एवं समीक्षकों द्वारा कई वर्षों से इस पुस्तक की एक समाजशास्त्रीय गौरव ग्रंथ के रूप में प्रशंसा की जाती रही है।

वर्तमान संस्करण, जो पाँच नए अध्यायों सहित एक विस्तारित संस्करण है, उप-जातियों के उद्भव को सविस्तार स्पष्ट करता है तथा जाति, उप-जाति एवं सगोत्रता का परीक्षण भी करता है। यह कई वर्षों के दौरान तमिलनाडु में अर्जित अनुभवों से प्राप्त उदाहरणों के द्वारा जाति एवं राजनीति के बीच के संबंधों का एक उत्तेजक एवं गहन विश्लेषण भी प्रस्तुत करता है। अंतिम अध्याय भारतीय समाज का एक प्रभावशाली विश्लेषण है। लेखक का मानना है कि भारत जातिविहीन के बजाय एक मिश्रित समाज बन जाएगा, जो इसके संविधान के रचयिताओं का स्वप्न था।

  • प्रस्तावना
  • जाति व्यवस्था की विशेषताएं
  • जातीय-समूहों की प्रकृति
  • युगों से गुजरती जाति-1
  • युगों से गुजरती जाति-2
  • प्रजाति एवं जाति
  • भारत के बाहर जाति के तत्व
  • जाति व्यवस्था की उत्पत्ति
  • जाति, उप-जाति: विलय अथवा विखंडन?
  • जाति, उप-जाति एवं सगोत्रता
  • ब्रिटिश शासन के दौरान जातियाँ
  • अनुसूचित जातियाँ
  • जाति एवं राजनीति: सामान्य
  • तमिलनाडु में जाति एवं राजनीति
  • एक जातिविहीन समाज या एक मिश्रित समाज?
जी. एस. घुर्ये

जी.एस. घुर्ये मुंबई विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर थे। संस्कृत, भारतीय विद्या, मानवजाति विज्ञान एवं इतिहास के प्रतिभाशाली विद्वान रहे प्रो. घुर्ये को भारत तथा अन्य देशों से संबंधित अनेकों विषयों पर समाजशास्त्रीय साहित्य के प्रति उनके अमूल्य एवं मौलिक योगदानों के लिए जाना जाता है।

Also available in:

PURCHASING OPTIONS

For shipping anywhere outside India
write to customerservicebooks@sagepub.in