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अटलांटिक गाँधी

समुद्र पार महात्मा

प्रवासी सिद्धांत, उत्तर-औपनिवेशिक संवाद तथा प्रतिरोधों के अध्ययन में हाल ही में शामिल हुए नए अटलांटिक पहलू जैसे ढांचों का प्रयोग करते हुए यह पुस्तक भारत जैसे पुरातन उपनिवेश से दक्षिण अफ्रीका के बागान एवं खनन समाज तक की, गाँधी की यात्रा के अनुभवों का वर्णन करती है। 

यह पुस्तक व्याख्या करती है कि गाँधी की राष्ट्रवादी भावनाएं (अर्थात उपनिवेशवाद-विरोधी भावनाएं) प्रवासीय निर्वासन के दौरान उपजीं, जहाँ उन्होंने बहु-नस्लीय भू-भाग में एक प्रांतीय प्रजा के रूप में अपना परिप्रेक्ष्य विकसित किया।

लेखक का दृष्टिकोण पिछले कुछ दशकों में सामने आए नए विश्लेषणों से प्रेरित है, जिनके अनुसार अटलांटिक ने महासागर के रूप में न केवल लालची बस्ती तंत्र (प्लांटेशन सिस्टम) के पीड़ितों को निकाला बल्कि क्रांतिकारी विचारों के उफान का भी गवाह बना।

  • प्रस्तावना
  • काठियावाड़ से
  • समुद्री यात्रा
  • कुली की विरचना
  • एक प्रवासीय राष्ट्र की नक्शानवीसी
  • स्थानीय विश्व नागरिक और आधुनिक प्रति-आधुनिक : हिंद स्वराज और सत्याग्रह इन साउथ अफ्रीका
  • ट्रांसवाल की तमिल स्त्रियाँ
  • गाँधी और अटलांटिक आधुनिकता
  • खादी में पैगंबर’ : दीनबंधु सी.एफ. एंड्रयूज
  • निष्कर्षः प्रवासीय गाँधी
  • ग्रंथ सूची
  • लेखक के बारे में
नलिनी नटराजन

नलिनी नटराजन अंग्रेजी विभाग, कॉलेज ऑफ ह्यूमैनिटीज, यूनिवर्सिटी ऑफ पोर्टो रीको, संयुक्त राज्य में प्रोफेसर हैं, जहां वे 1987 से अध्यापन कर रही हैं। इससे पहले, उन्होंने जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी, दिल्ली (1978-80) और मिरांडा हाउस, दिल्ली (1984-86) में पढ़ाया। वे येल यूनिवर्सिटी (1986-87) में पोस्ट डॉक्टोरल फेलो थीं। उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ एबरडीन, य ... अधिक पढ़ें

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