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भगवा बनाम तिरंगा

हिन्दुत्व, मुस्लिम अस्मिता और भारत की संकल्पना

हम एक ऐसे ज़माने में रह रहे हैं जिसमंे तक़रीबन सभी मुसलमान मुहम्मद इक़बाल का गीत ’सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ गाने में फ़ख्र महसूस करते हैं। हम में से ज़्यादातर लोग भूल गए हैं कि शायर और फ़लसफ़ी, इक़बाल ने राम को ’इमामे-हिन्द’ कह कर पुकारा था। इसी दौरान हिन्दुत्व की शक्तियों ने देश की एकता को चुनौती देने वाले अपने तंग-नज़री राष्ट्रवाद की आड़ में दिलों को जोड़ने वाले इस गीत को भुला दिया है। इनकी घोर भेद-भाव और अलगाव की सियासत तंग मानसिकता की उपज है। इनकी दुनिया “हम“ और “वो“ की दुनिया है - ऐसी दुनिया जिसमें एक मुसलमान की सरेआम पीट-पीट कर हत्या कर दी जाती है क्योंकि वो ‘वन्दे मातरम्’ बोलने से इंकार कर देता है ।
 
यह किताब सावरकर और गोलवलकर के समय से लेकर आज तक हिन्दुत्व की विचारधारा के विस्तार का नक्शा खींचती है। यह साबित करती है कि यह विचारधारा मुसलमानों के “तुष्टिकरण“ का ज़िक्र तक होने से पहले से चली आ रही है। अपने वजूद से जुडी चुनौतियों से जूझते हुए मुस्लिम समुदाय एक भीतरी मंथन से गुज़र रहा है, जिसमंे इस्लामी अदीब और शिक्षक फरहत हाश्मी के विचार ज़मीन पर एक खामोश बदलाव ला रहे हैं। इन सब चुनौतियों के बीच हिन्दुस्तान की बुनियादी कल्पना, जिस पर कई बार वार हुए हंै, दिशा ढूंढ़ते देश की रहबरी कर रही है।
 

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