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जननी

माँ, बेटियां, मातृत्व

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जननी, या जीवन की निर्माता के रूप में माँ, इस कथा संग्रह का आधार है। यह लेखन, कला, शिक्षाजगत जैसे कार्यक्षेत्रों से जुड़ी महिलाओं के उन आत्मकथात्मक लेखों को प्रस्तुत करता है, जिनमें उन्होंने माँ, बेटी या दोनों होने के अनुभव साझा किए हैं। उनके विवरणों में यादें और अतीत की स्मृतियां बड़ी सूक्ष्मता के साथ प्रस्तुत की गई हैं, जो लेखों को हृदयस्पर्शी बनाती हैं।संग्रह में दत्तक मातृत्व, सौतेली और अकेली माँ होने से जुड़े विवरण शामिल हैं। इसकी कहानियां जीवंतता के साथ मातृत्व के पहलुओं की पड़ताल करती हैं। यह माताओं-बेटियों के साथ-साथ पिताओं-बेटों और उन सभी को पढ़नी चाहिए जो रिश्तों के दुर्लभ उपहार को सराहते हैं।

  • मातृत्व — एक पुनरावलोकन - जशोधरा बागची
  • प्रस्तावना

भाग एक: हमारी माताएं

  • मेरी माँ भारती रे
  • मेरी माँ, मेरी बेटी मैत्रेयी चटर्जी
  • जब अलामेलु ने कंधे झटके सी.एस. लक्ष्मी
  • घर में बाहर वाला नीला भागवत
  • उनके अनंत रूप रोशनी जी. शाहनी
  • सूली ढोती औरत उर्मिला पवार
  • मेरी माँ का बगीचा तुतुन मुखर्जी
  • सत्रह की उम्र में सौतेली माँ मैथिली राव

भाग दो: हम स्वयं

  • मातृत्व और मैं धीरुबेन पटेल
  • एक माँ, मैं कमला दास
  • एक नाजुक बंधन प्रतिभा रानाडे
  • मातृत्वः मजाक नहीं है! नोबोनीता देव सेन
  • माँ बनना सीखना शशि देशपांडे
  • बच्चे नहीं, रोना नहीं! दीपा गहलोत

भाग तीन: हमारे बच्चे

  • बेटी से बढ़कर एक दोस्त ज्योत्स्ना कमल
  • मेरे बच्चों को पत्र मल्लिका साराभाई
  • चित्रकला और नर्सरी गीत रेखा रॉडविटिया
  • गुल्हड़ का रंग नीता रमैया
  • माँ, जो नहीं थी अन्वेषा आर्य
रिंकी भट्टाचार्य

रिंकी भट्टाचार्य बिमल रॉय स्मारक समिति की अध्यक्षा हैं। वो मुम्बई निवासी एक सुविदित पत्रकार तथा वृत्तचित्र निर्मात्री हैं। घरेलू हिंसा पर आधारित उनके वृत्तचित्र, चारदीवारी, को अंतर्राष्ट्रीय प्रशंसा प्राप्त हुई है। उन्होंने पाँच मिनटों का एक दृश्य-श्रव्य लघु चलचित्र जननी शीर्षक से निर्मित किया है जो इस पुस्तक की विषय-वस्तु पर ही आधारित है। सुश्री भ ... अधिक पढ़ें

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